न्यायालय के इस बड़े फैसले के बाद अंकित शर्मा के परिवार की वह खौफनाक यादें एक बार फिर जीवंत हो गई हैं, जिन्होंने उनके हंसते-खेलते परिवार को पूरी तरह उजाड़ दिया था। सुरक्षा कारणों और उस डरावने घटनाक्रम के मानसिक आघात के चलते पीड़ित परिवार उत्तर-पूर्वी दिल्ली के खजूरी खास स्थित अपने पैतृक मकान को हमेशा के लिए छोड़कर जा चुका है और तब से एक किराए के मकान में रहने को विवश है। अंकित शर्मा के बड़े भाई अंकुर शर्मा ने एक साक्षात्कार में अपने दिल का गुबार निकालते हुए न्याय व्यवस्था से मांग की है कि उनके भाई की हत्या करने वाले सभी दोषियों को कानूनन फांसी की सजा मिलनी चाहिए ताकि पीड़ित आत्मा को सच्ची शांति मिल सके।
घटनाक्रम के अनुसार, 25 फरवरी 2020 को आईबी अधिकारी अंकित शर्मा घर का कुछ जरूरी सामान लेने के लिए बाहर निकले थे, जिसके बाद वह अचानक लापता हो गए। जांच एजेंसियों और पुलिस के मुताबिक, उग्र दंगाइयों की एक हिंसक भीड़ ने अंकित को अगवा कर लिया था और बेहद क्रूरतापूर्वक उन पर धारदार हथियारों से हमला किया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि देश की सुरक्षा एजेंसी में कार्यरत इस युवा अधिकारी को अपराधियों ने 52 बार चाकू से गोदा था। इस वीभत्स वारदात को अंजाम देने के बाद हत्यारों ने साक्ष्य छिपाने के उद्देश्य से उनके खून से लथपथ शव को पास के ही एक गंदे नाले में फेंक दिया था, जिसे अगली सुबह पुलिस ने बरामद किया था।
अंकित शर्मा के परिजनों ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अंकित को केवल उनकी धार्मिक पहचान यानी हिंदू होने के कारण सोची-समझी साजिश के तहत निशाना बनाया गया था। उनके भाई अंकुर ने बताया कि अंकित एक बेहद मिलनसार और धर्मनिरपेक्ष सोच वाले व्यक्ति थे, जिनके मित्रों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही समुदायों के लोग शामिल थे। दुःख की बात यह रही कि जब दंगाइयों की भीड़ ने उन पर हमला किया, तो उनके कुछ स्थानीय मुस्लिम दोस्तों ने भी अंकित को बचाने के बजाय कातिलों का साथ दिया। इस खौफनाक मंजर की यादें परिवार को इस कदर प्रताड़ित करती हैं कि आज भी दंगों के क्षेत्र या उस नाले के पास से गुजरते समय उनका दिल भारी हो जाता है।
इस भयावह त्रासदी का अंकित शर्मा के माता-पिता के स्वास्थ्य पर अत्यंत प्रतिकूल और गंभीर प्रभाव पड़ा है। जवान बेटे की इस तरह हुई असमय और क्रूर मौत के सदमे के कारण उनके माता-पिता गंभीर रूप से उच्च रक्तचाप (हाई बीपी) और मानसिक तनाव का शिकार हो चुके हैं। अदालती कार्यवाही या दंगों से जुड़ी किसी भी चर्चा मात्र से ही उनका पूरा परिवार भारी अवसाद और तनाव की स्थिति में आ जाता है। पीड़ित परिवार का स्पष्ट रूप से मानना है कि उनके साथ पूर्ण और वास्तविक न्याय तभी होगा जब देश के लिए बलिदान देने वाले उनके बेटे के हत्यारों को कानून के तहत अधिकतम और कठोरतम संभव दंड दिया जाएगा।
