डॉ. धनंजय के मुताबिक बचपन में गर्मी की छुट्टियों के दौरान वह करीब दो महीने के लिए आगरा जाते थे। उस समय बाबा से उनकी मुलाकात होती थी और उन्हें बाबा का भरपूर लाड़ प्यार मिला। करीब 13 साल तक उन्होंने बाबा को बेहद करीब से देखा। धनंजय कहते हैं कि उनके लिए नीम करोली बाबा पहले किसी बड़े संत या आध्यात्मिक गुरु से ज्यादा उनके अपने बाबा थे। घर में बाबा का व्यवहार भी बिल्कुल सामान्य रहता था। उन्होंने कभी बच्चों को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह कोई बहुत बड़े संत हैं।
नीम करोली बाबा करीब 40 साल तक गांव के प्रधान भी रहे थे। उनके व्यक्तित्व का यह पहलू भी उनके पोते की यादों में दर्ज है। धनंजय बताते हैं कि बाबा से जुड़े भक्त जब अपने अनुभव सुनाते हैं तो उन्हें कई बार हैरानी होती है। भक्तों का मानना है कि बाबा की कृपा से उनके जीवन की मुश्किल परिस्थितियां आसान हुईं और कई कठिन काम पूरे हुए।
साल 1973 में जब नीम करोली बाबा का निधन हुआ तब धनंजय का परिवार भोपाल में ही था। उन्हें सुबह करीब आठ बजे ऑल इंडिया रेडियो के समाचार से बाबा के निधन की जानकारी मिली। उनके मुताबिक बाबा के निधन के बाद भी भक्तों की आस्था कम नहीं हुई। इसी संदर्भ में वह देवरहा बाबा से जुड़ा एक प्रसंग भी बताते हैं। उनके अनुसार जब कुछ भक्त देवरहा बाबा के पास पहुंचे और उन्हें बताया कि नीम करोली बाबा अब नहीं रहे तो वह भावुक होकर रोने लगे। उन्होंने भक्तों से कहा था कि नीम करोली बाबा कहीं नहीं गए और वह अपने भक्तों के साथ बने रहेंगे।
डॉ. धनंजय शर्मा ने भोपाल में डॉक्टर के रूप में सेवाएं दीं। उन्होंने हमीदिया समेत कई अस्पतालों में काम किया और बाद में सेवानिवृत्त हुए। फिल्म हनुमान अंश की रिलीज से पहले इसके निर्देशक भी भोपाल पहुंचे थे और उन्होंने धनंजय को फिल्म दिखाई थी। शुरुआत में भोपाल में फिल्म को पर्याप्त शो नहीं मिल रहे थे और टिकटों की बिक्री भी कम थी। इसके बाद कुछ भक्तों ने पहल की। उन्होंने करीब 50 से 100 लोगों के टिकट खुद बुक किए और उन्हें फिल्म मुफ्त में दिखाई। धीरे धीरे दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी और फिल्म ने रफ्तार पकड़ ली। धनंजय इसे बाबा का चमत्कार मानते हैं।
धनंजय की पत्नी शैलजा भी शादी के बाद बाबा से जुड़ीं। उनकी शादी 1987 में हुई थी। परिवार और भक्तों से बाबा के बारे में जानने के बाद उन्होंने कई किताबें पढ़ीं और धीरे धीरे उनकी भी बाबा के प्रति आस्था बढ़ती चली गई।
वहीं नीम करोली बाबा के पुश्तैनी घर को लेकर भी विवाद सामने आया है। बताया जाता है कि बाबा का बचपन उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में बीता था। उनके पुश्तैनी घर और उससे जुड़े परिसर के रखरखाव को लेकर परिवार और ट्रस्ट के बीच विवाद की स्थिति है। परिवार की ओर से ट्रस्ट के पदाधिकारी पर कब्जे का आरोप लगाए जाने की बात भी सामने आई है। दूसरी ओर डॉ. धनंजय का कहना है कि उत्तराखंड के कैंची धाम और उत्तर प्रदेश के नीम करोली को लेकर लोगों में भ्रम है। उनके अनुसार दोनों अलग स्थान हैं और इनकी सही पहचान स्पष्ट होना जरूरी है।
नीम करोली बाबा से जुड़ी इन पारिवारिक यादों ने एक बार फिर उनके जीवन और व्यक्तित्व को चर्चा में ला दिया है। फिल्म हनुमान अंश के जरिए बाबा की कहानी बड़े पर्दे तक पहुंची है और अब उनके परिवार की यादें लोगों को उनके जीवन का एक अलग और निजी पहलू दिखा रही हैं।
