पेट्रोल-डीजल बेचने में कंपनियों को घाटा
महंगे अंतरराष्ट्रीय क्रूड के बावजूद सरकारी तेल कंपनियां यानी OMCs घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की सप्लाई जारी रखे हुए हैं। ICRA के मुताबिक सितंबर में अब तक के औसत क्रूड भाव के आधार पर कंपनियों को पेट्रोल पर करीब ₹5 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹23 प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।
यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की लागत बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में ईंधन अपेक्षाकृत कम कीमत पर बिक रहा है। इससे कंपनियों के मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ रहा है।
LPG पर भी करीब ₹200 की अंडर रिकवरी
OMCs के लिए सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही चुनौती नहीं हैं। घरेलू LPG पर भी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। ICRA के अनुसार एक LPG सिलिंडर पर करीब ₹200 की अंडर रिकवरी हो रही है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो कंपनियों की कमाई और प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में भविष्य में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का रास्ता खुल सकता है।
अभी तुरंत दाम बढ़ने की गारंटी नहीं
फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ेंगे, यह कहना जल्दबाजी होगी। घरेलू ईंधन की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड के भाव से तय नहीं होतीं। सरकार की प्राइसिंग पॉलिसी, टैक्स और तेल कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन की भी इसमें अहम भूमिका होती है।
मई में सरकार ने चार किस्तों में पेट्रोल की कीमत कुल ₹7.35 प्रति लीटर और डीजल की कीमत ₹7.53 प्रति लीटर बढ़ाई थी। इसके बाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव रहा है और कंपनियों ने तत्काल उसी अनुपात में घरेलू कीमतों में बदलाव नहीं किया।
हालांकि, अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर के ऊपर रहता है और OMCs का घाटा लगातार बढ़ता है, तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का दबाव बन सकता है।
भारत पर क्यों बढ़ेगा दबाव?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90% हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है।
आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत का क्रूड आयात बिल 56.5% बढ़कर 63.4 अरब डॉलर पहुंच गया। खास बात यह रही कि इस दौरान कच्चे तेल के आयात की मात्रा लगभग स्थिर रही। यानी आयात बिल में हुई बड़ी बढ़ोतरी का प्रमुख कारण तेल की ऊंची कीमतें रहीं।
अगर क्रूड की कीमतें आगे भी ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है। इससे रुपए पर दबाव आने की आशंका रहेगी और आगे चलकर महंगाई का जोखिम भी बढ़ सकता है।
