हिंदू पंचांग के अनुसार पितृपक्ष की शुरुआत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है। इसे श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष भी कहा जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर, शनिवार से शुरू होगा और 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।
26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा। इसके बाद 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध, 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध, 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध और 30 सितंबर को चतुर्थी तथा पंचमी श्राद्ध किया जाएगा। अक्टूबर में 1 तारीख को षष्ठी श्राद्ध, 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध, 3 अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध और 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध रहेगा।
इसके बाद 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध, 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध, 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या रहेगी, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होगा।
सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तब भी सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने का धार्मिक महत्व बताया गया है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु जिस हिंदू तिथि को हुई हो, पितृपक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है। इसलिए श्राद्ध की तिथि केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख के आधार पर तय नहीं की जाती। इसके लिए हिंदू पंचांग में मृत्यु की तिथि को देखा जाता है। यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार श्राद्ध का समय निर्धारित किया जाता है।
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म में संकल्प, तर्पण, पिंडदान, सात्विक भोजन का अर्पण और दान जैसी परंपराएं शामिल मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन का एक हिस्सा गाय, कौवे और कुत्ते के लिए भी अलग रखा जाता है।
तर्पण के दौरान जल में काले तिल, जौ और कुशा मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित करने की परंपरा है। इसके अलावा संबंधित पूर्वज की मृत्यु तिथि पर पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए प्रार्थना पूरी होती है।
