नई दिल्ली। ड्रोन के बढ़ते खतरे के बीच भारत ने निर्देशित ऊर्जा हथियारों के क्षेत्र में एक अहम तकनीकी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने करीब 30 किलोवाट क्षमता वाले काउंटर-ड्रोन लेजर हथियार की तकनीक को परीक्षणों के जरिए साबित कर दिया है। अब इसे उत्पादन के स्तर तक ले जाने की तैयारी है। डीआरडीओ अगले छह महीनों में इसके लिए औद्योगिक साझेदार तलाशने और एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी करने की योजना बना रहा है।
5 किलोमीटर तक ड्रोन स्वार्म को निशाना
ट्रक पर लगाए जाने वाले इस लेजर सिस्टम को मुख्य रूप से ड्रोन और अन्य मानवरहित हवाई वाहनों से निपटने के लिए विकसित किया गया है। यह करीब पांच किलोमीटर तक की दूरी पर ड्रोन स्वार्म, फिक्स्ड-विंग यूएवी और निगरानी सेंसरों को निशाना बनाने में सक्षम है। डीआरडीओ के अनुसार, इस तकनीक का अंतिम परीक्षण अगस्त 2025 में पूरा हुआ था।
इस प्रणाली का एक महत्वपूर्ण पहलू एक साथ कई ड्रोन से निपटने की क्षमता है। अप्रैल 2025 में आंध्र प्रदेश के कुरनूल स्थित नेशनल ओपन एयर रेंज में इसके परीक्षण के दौरान फिक्स्ड-विंग ड्रोन के खिलाफ इसकी क्षमता प्रदर्शित की गई थी। कई ड्रोन के हमले और निगरानी सेंसरों को निष्क्रिय करने की क्षमता का भी प्रदर्शन किया गया था।
मिसाइल के बजाय लेजर बीम से हमला
डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (DEW) में उच्च ऊर्जा वाली लेजर बीम का इस्तेमाल लक्ष्य को नुकसान पहुंचाने या उसके इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को निष्क्रिय करने के लिए किया जाता है। लेजर बीम प्रकाश की गति से लक्ष्य तक पहुंचती है, इसलिए मिसाइल या पारंपरिक प्रोजेक्टाइल की तरह उसे लक्ष्य तक पहुंचने में उड़ान समय नहीं लगता।
इस तरह की प्रणाली का एक संभावित लाभ यह है कि हर लक्ष्य के लिए अलग इंटरसेप्टर मिसाइल की जरूरत नहीं पड़ती। पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध रहने पर सिस्टम दोबारा लक्ष्य साध सकता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में कम लागत वाले ड्रोन के खिलाफ निर्देशित ऊर्जा हथियारों को उपयोगी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत
हाल के संघर्षों में कम लागत वाले ड्रोन के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने काउंटर-ड्रोन प्रणालियों की जरूरत बढ़ाई है। रिपोर्टों के अनुसार, मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ड्रोन के इस्तेमाल ने ऐसे हथियारों के विकास और तैनाती की आवश्यकता को और रेखांकित किया। कम कीमत वाले ड्रोन के खिलाफ हर बार महंगे मिसाइल इंटरसेप्टर का इस्तेमाल करना खर्चीला हो सकता है।
छह महीने में अगला कदम, फिर फर्स्ट-ऑफ-प्रोडक्शन मॉडल
डीआरडीओ के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन सिस्टम्स महानिदेशक डॉ. बीके दास के अनुसार, अगले छह महीनों में इस प्रणाली के लिए उद्योग साझेदार चुनने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके बाद फर्स्ट-ऑफ-प्रोडक्शन मॉडल (FOPM) तैयार किया जाएगा, जिसका आगे परीक्षण किया जाएगा। इसलिए फिलहाल इसे बड़े पैमाने पर उत्पादन में प्रवेश कर चुका हथियार कहना जल्दबाजी होगी; अभी विकास से उत्पादन की ओर बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो रही है।
डीआरडीओ पहले ही कम क्षमता वाले निर्देशित ऊर्जा हथियारों पर भी काम कर रहा है। 2 किलोवाट श्रेणी की प्रणाली उत्पादन में है, जबकि 10 किलोवाट प्रणाली के लिए भी आगे की खरीद प्रक्रिया चल रही है। 30 किलोवाट प्रणाली इस तकनीकी श्रृंखला में अधिक क्षमता वाला अगला चरण है।
इस स्वदेशी तकनीक के उत्पादन में आने के बाद भारतीय सशस्त्र बलों के पास ड्रोन और यूएवी जैसे हवाई खतरों से निपटने के लिए मिसाइलों के अलावा एक अतिरिक्त निर्देशित ऊर्जा विकल्प उपलब्ध हो सकेगा।
