अदालत ने आरोपी प्रदीप राठौड़ और उसके पिता ओमप्रकाश राठौड़ को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 120 बी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। दोनों पर प्रत्येक अपराध के लिए 500 रुपए का अर्थदंड भी लगाया गया है। मामले का तीसरा आरोपी रविशंकर अब भी फरार है जिसकी तलाश जारी है।
यह मामला 27 जून 2014 का है जब लसूड़िया क्षेत्र में जमीन विवाद के चलते बड़े भाई अतुल राठौड़ की हत्या कर दी गई थी। जांच में सामने आया कि हत्या की साजिश परिवार के भीतर ही रची गई थी और जमीन के विवाद ने रिश्तों को इस हद तक तोड़ दिया कि पिता और छोटे भाई ने मिलकर बड़े भाई की जान ले ली।
फैसला सुनाते समय अदालत ने कहा कि सजा तय करते समय अपराध की गंभीरता और आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दंड हमेशा अपराध की प्रकृति और गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी में नहीं आता इसलिए इसमें मृत्युदंड देने का आधार नहीं बनता। अदालत ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ पहले किसी भी प्रकार का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और घटना के बाद भी उनके खिलाफ किसी अन्य गंभीर आपराधिक गतिविधि का उल्लेख नहीं मिला। इन परिस्थितियों के साथ उनकी सामाजिक आर्थिक और पारिवारिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आजीवन कारावास को उपयुक्त सजा माना।
सरकार की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक योगेश जायसवाल ने अदालत में प्रभावी पैरवी की। साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि हत्या सुनियोजित थी और इसका मुख्य कारण जमीन का विवाद था।
यह फैसला केवल एक हत्या के मामले में सजा का आदेश नहीं बल्कि समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि संपत्ति और लालच के कारण यदि कोई व्यक्ति अपने ही रिश्तों का खून करता है तो कानून उसे किसी भी कीमत पर बख्शता नहीं है। परिवार विश्वास और भाईचारे जैसे रिश्ते समाज की सबसे मजबूत नींव माने जाते हैं और जब इन्हीं रिश्तों को लालच की भेंट चढ़ा दिया जाता है तो उसका परिणाम कठोर कानूनी दंड के रूप में सामने आता है। अदालत की टिप्पणी भी यही याद दिलाती है कि रिश्तों का मूल्य किसी भी संपत्ति से कहीं अधिक बड़ा होता है।
