रिपोर्ट में उजागर किया गया है कि वर्तमान समय में लगभग 2,369 संदिग्ध प्रवासियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि का मामला बांग्लादेश सरकार के पास लंबित पड़ा हुआ है। स्थायी समिति का मानना है कि दोनों देशों के बीच एक औपचारिक और जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा बनने से पहचान सत्यापन की यह प्रक्रिया त्वरित गति से पूरी की जा सकेगी। इसके साथ ही, समिति ने यह मानवीय और कानूनी हिदायत भी दी है कि जांच और सत्यापन की पूरी प्रक्रिया के दौरान पूरी सतर्कता बरती जाए ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को गलती से सीमा पार न भेजा जाए और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।
सीमा सुरक्षा के तकनीकी पहलुओं का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि दोनों देशों के बीच फैली 4,096 किलोमीटर लंबी कुल सीमा में से लगभग 3,231 किलोमीटर हिस्से में ही सुरक्षा बाड़ लगाई जा सकी है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, नदी क्षेत्रों और विवादित भूखंडों के कारण अभी भी करीब 864 किलोमीटर की सीमा बिना बाड़ के खुली हुई है, जिसका फायदा अवैध गतिविधियों के लिए उठाया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार इस घुसपैठ का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव सीमावर्ती राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और असम पर पड़ रहा है, जहां सुरक्षा एजेंसियों को लगातार सतर्क रहना पड़ता है।
सुरक्षा चिंताओं के अलावा समिति ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक नियमों के दुरुपयोग पर भी गंभीर आपत्ति जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) के तहत मिलने वाली रियायतों का गलत फायदा उठाकर तीसरे देशों की सामग्री, विशेष रूप से चीनी कपड़ों और उत्पादों को बांग्लादेश के रास्ते भारतीय बाजारों में खपाया जा रहा है। इससे घरेलू उद्योगों और निष्पक्ष व्यापार प्रतिस्पर्धा को भारी नुकसान पहुंच रहा है। समिति ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय को व्यापारिक नियमों को और अधिक कड़ा करने और उच्च स्तर पर इस मुद्दे को उठाने का परामर्श दिया है।
संसदीय समिति ने सुरक्षा और व्यापारिक कड़ाई के साथ-साथ कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को पुनः पटरी पर लाने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। स्थिति सामान्य होते ही वीजा सेवाओं को चरणबद्ध तरीके से सुचारू करने, वार्षिक संयुक्त साहित्य महोत्सवों के आयोजन और युवाओं के आदान-प्रदान के माध्यम से जन-सामान्य के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके अतिरिक्त, समिति ने वैश्विक पटल पर भारत की वैज्ञानिक और कूटनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए ‘ध्रुवीय राजदूत’ की नियुक्ति और अंटार्कटिका में अनुसंधान केंद्रों के निर्माण में तेजी लाने का सुझाव भी दिया है।
