अक्सर यह सवाल सामने आता है कि दाह संस्कार के बाद तीसरे या चौथे दिन ही अस्थियां क्यों चुनी जाती हैं। गरुड़ पुराण और हिंदू धार्मिक परंपराओं में इसके लिए अलग अलग मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। कई परंपराओं में दाह संस्कार के दूसरे या तीसरे दिन अस्थियां एकत्र करने की बात कही गई है जबकि कुछ स्थानों पर मुखाग्नि देने वाले व्यक्ति से जुड़ी रस्म के अनुसार चौथे दिन अस्थि संचयन किया जाता है। इसे मृतक के प्रति परिवार का अंतिम कर्तव्य माना जाता है
पुराने समय में श्मशान घाट अपेक्षाकृत शांत और कम भीड़ वाले होते थे। ऐसे में परिवार के लोग निर्धारित समय के अनुसार वहां जाकर अस्थियां एकत्र कर लेते थे। आज बड़े शहरों में स्थिति काफी बदल चुकी है। श्मशान घाटों पर लगातार अंतिम संस्कार होने के कारण राख और अस्थियों को लंबे समय तक उसी स्थान पर छोड़ना व्यावहारिक नहीं होता। इनके बिखरने या किसी दूसरी चिता की राख के साथ मिल जाने की आशंका भी रहती है। इसलिए कई परिवार वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जल्द ही अस्थियां एकत्र कर लेते हैं
अस्थियां चुनने के दौरान भी धार्मिक रीति का पालन किया जाता है। परिवार के सदस्य श्मशान स्थल पर जाकर प्रार्थना करते हैं और सावधानी से अस्थियों को एकत्र करते हैं। कई हिंदू परंपराओं में अस्थियों को दूध और पवित्र जल से स्नान कराने के बाद चंदन तथा फूल अर्पित करने की मान्यता है। इसके बाद अस्थियों को किसी पवित्र नदी में ले जाकर विधि विधान के साथ विसर्जित किया जाता है
कई बार किसी कारण से परिवार निर्धारित तीसरे या चौथे दिन अस्थि विसर्जन नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घबराने की जरूरत नहीं मानी जाती। अस्थियों को सम्मानपूर्वक साफ और सुरक्षित स्थान पर रखा जा सकता है और बाद में परिवार की सुविधा तथा परंपरा के अनुसार किसी शुभ अवसर पर उनका विसर्जन किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अपने परिवार के कुल पुरोहित या स्थानीय धार्मिक परंपरा के जानकार से सलाह लेना उचित माना जाता है क्योंकि अलग अलग क्षेत्रों में विधियां अलग हो सकती हैं
हिंदू धर्म में गंगा नदी को विशेष रूप से पवित्र माना गया है। इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग हरिद्वार और वाराणसी जैसे तीर्थ स्थानों पर जाकर अस्थि विसर्जन करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि गंगा में अस्थियों का विसर्जन करने से मृतक को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। हालांकि इन मान्यताओं का संबंध धार्मिक आस्था से है और इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए
वर्तमान समय में धार्मिक परंपरा के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है। अस्थि विसर्जन करते समय प्लास्टिक कपड़े या ऐसी अन्य सामग्री नदी में नहीं डालनी चाहिए जो जल को प्रदूषित करे। श्रद्धा और धार्मिक परंपरा का पालन करते हुए नदियों की स्वच्छता बनाए रखना भी समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है
