भारत में भी फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ रही है। आमतौर पर इसे अधिक वजन और मोटापे से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि जिन लोगों का वजन ज्यादा होता है, उनमें लिवर में चर्बी जमा होने का खतरा अधिक रहता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुबले-पतले या सामान्य वजन वाले लोग इससे पूरी तरह सुरक्षित हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर का वजन सामान्य होने के बावजूद लिवर में अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है। मेडिकल क्षेत्र में ऐसे मामलों को लंबे समय से लीन फैटी लिवर के रूप में जाना जाता रहा है। फैटी लिवर वाले कुछ लोगों का शरीर दुबला हो सकता है, इसलिए केवल शरीर का आकार देखकर लिवर को स्वस्थ मान लेना सही नहीं है।
दुबले-पतले लोगों में फैटी लिवर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इंसुलिन रेजिस्टेंस, पेट के अंदर जमा आंतरिक चर्बी, डायबिटीज, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल जैसी मेटाबोलिक समस्याएं इसका जोखिम बढ़ा सकती हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभा सकते हैं।
इसके अलावा शराब का सेवन, कुछ दवाएं और लिवर से जुड़ी अन्य बीमारियां भी लिवर में चर्बी जमा होने का कारण बन सकती हैं। इसलिए यह मानना सही नहीं है कि दुबला शरीर होने की वजह से फैटी लिवर का खतरा नहीं हो सकता।
सामान्य बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि शरीर में चर्बी का वितरण भी स्वस्थ है। कुछ लोगों का शरीर बाहर से दुबला दिखाई दे सकता है, लेकिन पेट के आसपास या शरीर के अंदर अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है। ऐसी स्थिति में मेटाबोलिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है और फैटी लिवर का खतरा बढ़ सकता है।
डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड जैसी समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दुबले-पतले लोगों में यदि इनमें से कोई जोखिम मौजूद है तो डॉक्टर से सलाह लेकर आवश्यक जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है।
फैटी लिवर की शुरुआत अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के होती है। कई लोगों को बीमारी के शुरुआती चरण में कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती। यदि जांच के दौरान लिवर एंजाइम बार-बार बढ़े हुए मिल रहे हैं या डायबिटीज जैसी मेटाबोलिक समस्या मौजूद है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर लिवर के स्वास्थ्य और फैटी लिवर के जोखिम का मूल्यांकन कराया जा सकता है।
फैटी लिवर से बचाव के लिए सिर्फ वजन कम करना ही पर्याप्त नहीं है। दुबले-पतले लोगों के लिए भी नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खानपान और अत्यधिक चीनी तथा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से दूरी बनाए रखना जरूरी है। डायबिटीज, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना भी लिवर के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
अगर जांच में फैटी लिवर की पुष्टि हो चुकी है तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार लिवर की स्थिति और फाइब्रोसिस के जोखिम का मूल्यांकन कराया जाना चाहिए। समय रहते खानपान और जीवनशैली में जरूरी बदलाव करने तथा जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय उपचार लेने से बीमारी के बढ़ने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
