मध्य प्रदेश में सरकारी परिवहन डेटा की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। एक निजी वेबसाइट पर बिना स्पष्ट ऑथेंटिकेशन प्रक्रिया के वाहनों के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट यानी RC डाउनलोड किए जाने का दावा किया गया है। इस प्रक्रिया में कई प्रमुख नेताओं और मंत्रियों के वाहनों की जानकारी सामने आने की बात कही गई है।
मामले की पड़ताल के दौरान वेबसाइट पर वाहन संबंधी सेवाओं के लिए भुगतान आधारित व्यवस्था दिखाई दी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक RC डाउनलोड करने के लिए 30 रुपये का शुल्क लिया जा रहा था। सबसे गंभीर बात यह बताई गई कि RC हासिल करने के लिए सामान्य सरकारी प्रक्रिया जैसी अतिरिक्त पहचान या ओटीपी सत्यापन की आवश्यकता नहीं दिखाई दी।
जांच में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर कुछ नेताओं के वाहन नंबरों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद संबंधित वाहनों की RC वेबसाइट पर उपलब्ध होने का दावा किया गया। इस प्रक्रिया में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के वाहन की जानकारी भी सामने आने की बात कही गई है।
उपलब्ध विवरण के मुताबिक, RC में वाहन से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां दिखाई दे रही थीं। इनमें चेसिस नंबर, इंजन नंबर और वाहन के वित्तपोषण से जुड़े बैंक की जानकारी शामिल होने का दावा किया गया है। निजी वाहन दस्तावेज में इस तरह की जानकारी उपलब्ध होना डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के लिहाज से महत्वपूर्ण चिंता का विषय है।
मध्य प्रदेश के परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह के दो वाहनों की RC भी इसी तरह उपलब्ध होने का दावा किया गया। इसके अलावा तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार के वाहन से जुड़ा दस्तावेज भी वेबसाइट पर दिखाई देने की बात सामने आई है।
पड़ताल का दायरा मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं बताया गया। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से जुड़े कई वाहनों की RC भी वेबसाइट पर उपलब्ध होने का दावा किया गया है। इससे यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि यदि अलग-अलग राज्यों के वाहनों का डेटा इस तरह आसानी से हासिल किया जा सकता है, तो परिवहन रिकॉर्ड की सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
सरकारी व्यवस्था में RC डाउनलोड करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया में वाहन का पंजीयन नंबर डालने के बाद अतिरिक्त जानकारी और सत्यापन की जरूरत होती है। कई मामलों में वाहन से जुड़ी जानकारी तथा ओटीपी के जरिए पहचान की पुष्टि के बाद दस्तावेज डाउनलोड किया जाता है। ऐसी स्थिति में किसी निजी प्लेटफॉर्म पर इससे अलग प्रक्रिया के जरिए RC उपलब्ध होने का दावा जांच का विषय बन जाता है।
वाहन पंजीयन प्रमाणपत्र केवल वाहन की सामान्य पहचान तक सीमित दस्तावेज नहीं है। इसमें ऐसी सूचनाएं भी हो सकती हैं जिनका गलत इस्तेमाल फर्जी दस्तावेज तैयार करने, वाहन की पहचान बदलने या किसी अन्य वाहन के साथ गलत तरीके से जोड़ने जैसी गतिविधियों में किया जा सकता है।
ऐसे डेटा के सार्वजनिक या अनधिकृत तरीके से उपलब्ध होने की स्थिति में आम वाहन मालिकों की निजता भी प्रभावित हो सकती है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वेबसाइट पर अलग-अलग राज्यों के वाहनों की जानकारी उपलब्ध होने का दावा किया गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह डेटा निजी प्लेटफॉर्म तक किस माध्यम से पहुंचा और क्या किसी सरकारी या अधिकृत सिस्टम से इसकी अनधिकृत पहुंच संभव हुई। साथ ही यह भी जांचना जरूरी होगा कि कितने वाहनों की जानकारी इस तरह उपलब्ध है और डेटा को सुरक्षित रखने के लिए संबंधित विभागों ने कौन-कौन से तकनीकी उपाय लागू किए हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए परिवहन डेटा के स्रोत, वेबसाइट की कार्यप्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था की विस्तृत जांच जरूरी मानी जा रही है। यदि अनधिकृत तरीके से सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंच की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी तय करने के साथ प्रभावित डेटा को सुरक्षित करने के कदम भी उठाने होंगे।
