सिवनी जिला अस्पताल का यह मामला उस समय चर्चा में आया जब भाजपा विधायक दिनेश राय मुनमुन ने 10 अक्टूबर 2026 को अस्पताल की एसएनसीयू का दौरा किया। उन्हें जानकारी मिली कि तीन महीने के भीतर 46 नवजातों की मौत हो चुकी है। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर मामले की जांच कराने की मांग की। सरकार ने जांच के लिए चार डॉक्टरों की टीम बनाई। जांच में सामने आया कि छह महीने में 1088 नवजात भर्ती हुए थे और इनमें से 80 की मौत हुई। इस रिपोर्ट के बाद एसएनसीयू प्रभारी डॉ. पारस पटेरिया को पद से हटा दिया गया।
मामले की गंभीरता उन परिवारों की आपबीती से भी सामने आती है जिन्होंने अपने नवजात बच्चों को खोया। बरघाट की माधुरी पटले ने 14 अप्रैल को 2.6 किलो वजन के बेटे को जन्म दिया था। परिवार के मुताबिक बच्चे को स्वस्थ बताकर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। घर पहुंचने के बाद उसे तेज बुखार आया और दोबारा अस्पताल ले जाने पर एसएनसीयू में भर्ती किया गया। पांच दिन बाद बच्चे की मौत हो गई। पिता कमलेश ने सवाल उठाया कि यदि बच्चा बीमार था तो उसे बिना पर्याप्त जांच के छुट्टी क्यों दी गई।
एक अन्य मामले में बरघाट के राहुल और पूजा बाहेश्वर के जुड़वां बच्चों की मौत हो गई। परिवार के मुताबिक गर्भावस्था के छठे महीने में दर्द शुरू होने पर निजी डॉक्टर ने उन्हें सिवनी जिला अस्पताल भेजा। दोपहर करीब एक बजे अस्पताल पहुंचने के बाद भी उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता नहीं मिल सकी। परिवार का आरोप है कि पूजा दर्द से परेशान होकर वॉशरूम गईं जहां एक बच्चे का जन्म हो गया। बाद में दूसरे बच्चे का जन्म लेबर रूम में हुआ। दोनों नवजातों को एसएनसीयू में भर्ती कराया गया लेकिन कुछ ही घंटों में उनकी मौत हो गई।
जामुन टोला की प्रियंका कुसाम के मामले में आर्थिक परेशानी भी सामने आई। उन्होंने सातवें महीने में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया लेकिन दोनों को बचाया नहीं जा सका। परिवार के मुताबिक पैसों की कमी के कारण गर्भावस्था के शुरुआती छह महीनों में सोनोग्राफी नहीं हो सकी थी। आशा कार्यकर्ता ने यह भी बताया कि प्रियंका को प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का पोषण भत्ता नहीं मिला था।
दूसरी ओर अस्पताल के अधिकारियों ने मौतों के पीछे बच्चों की गंभीर स्थिति और समय से पहले जन्म को प्रमुख वजह बताया है। सिविल सर्जन डॉ. विनोद नवकर और सीएमएचओ डॉ. पंकज दुबे के मुताबिक 80 मृत बच्चों में से 58 प्रीमैच्योर थे। इनमें 18 बच्चों का वजन एक किलो से भी कम था। अधिकारियों का कहना है कि एसएनसीयू में बेहद गंभीर स्थिति वाले नवजात ही लाए जाते हैं और यहां एक हजार से अधिक बच्चों की जान भी बचाई गई है। उन्होंने करीब 8 से 10 प्रतिशत तक मृत्यु दर को सामान्य बताने वाली दलील दी है।
हालांकि एनएचएम के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर और सेवानिवृत्त सीएमएचओ डॉ. पंकज शुक्ला ने अधिकारियों के तर्कों पर असहमति जताई है। उनके मुताबिक वर्ष 2010 में यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से तैयार एसएनसीयू दिशा-निर्देशों में भी मृत्यु दर की अधिकतम सीमा 6 प्रतिशत रखी गई थी। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. वंदना प्रसाद का कहना है कि गंभीर बच्चों के भर्ती होने का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। अस्पताल में इलाज की गुणवत्ता और व्यवस्थाओं की समीक्षा जरूरी है।
भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की 2024 की सांख्यिकीय रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में हर एक हजार जीवित जन्मों पर 35 बच्चों की मृत्यु उनके पहले जन्मदिन से पहले हो जाती है। इस मामले में राज्य देश में दूसरे स्थान पर बताया गया है। इनमें 28 बच्चों की मौत जन्म के शुरुआती 28 दिनों के भीतर होती है। पांच वर्षों में आंकड़ों में सुधार के बावजूद राज्य राष्ट्रीय औसत से पीछे है। सिवनी अस्पताल के आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं जब नवजातों की सुरक्षा और सरकारी अस्पतालों में बेहतर उपचार व्यवस्था को लेकर जवाबदेही की मांग तेज हो रही है।
