प्रशांत अंजाना-
*गेती घर पर नहीं चली होगी… शायद बचपन पर चली होगी*
उज्जैन।रविवार को गेती की एक चोट ने सड़क की चौड़ाई तो बढ़ाई, *लेकिन शायद किसी के भीतर का एक कोना थोड़ा और छोटा कर दिया होगा।*
वह मकान कोई साधारण मकान नहीं था। वह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का पैतृक घर था—वही घर, जिसकी दीवारों ने उनका बचपन देखा होगा। *जहां कदमों ने चलना सीखा होगा, जहां स्कूल जाने की जल्दी रही होगी, जहां मां की आवाज ने पुकारा होगा और जहां शामें आज की तरह मुख्यमंत्री की व्यस्तताओं में नहीं, बल्कि बच्चे मोहन की दुनिया में ढलती रही होंगी।*
फिर एक दिन वही बच्चा बड़ा होकर मुख्यमंत्री बना और *उसी घर के सामने विकास की गेती लेकर खड़ा हो गया।*
गेती हाथ में थी, मगर सामने सिर्फ दीवार नहीं थी।
*सामने बचपन खड़ा था।*
क्या उन्हें वह आंगन याद आया होगा? क्या किसी कमरे की कोई खिड़की अचानक बोल उठी होगी? क्या दीवार की कोई दरार उन्हें उन दिनों तक ले गई होगी, जिन्हें समय ने बहुत पीछे छोड़ दिया है?
*हम नहीं जानते।*
और शायद यही इस दृश्य की सबसे खूबसूरत बात है—
*भावनाएं कैमरे में पूरी तरह दिखाई नहीं देतीं।*
सड़क खजूर वाली मस्जिद से अब्दालपुरा, जीवाजीगंज थाना होते हुए गणेश चौक तक चौड़ी होगी। करीब 730 मीटर लंबे मार्ग को 15 मीटर किया जाएगा और लगभग 9.80 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सिंहस्थ के दौरान यातायात और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यह जरूरी विकास है।
लेकिन इस विकास की कहानी में एक निजी अध्याय भी है।
किसी और का मकान टूटता तो शायद वह सिर्फ एक निर्माण होता,
*अपना मकान टूटे तो इतिहास टूटता है।*
बचपन लौटकर नहीं आता। मकान फिर बन सकता है, सड़क फिर चमक सकती है, शहर आगे बढ़ सकता है। *लेकिन जिस घर में बचपन बीता हो, उसकी मिट्टी को छोड़ना शायद विकास की सबसे महंगी कीमतों में से एक है।*
और रविवार को उज्जैन ने शायद यही देखा-
*एक मुख्यमंत्री ने अपने हाथ से दीवार नहीं, अपनी स्मृतियों और सार्वजनिक दायित्व के बीच की दूरी पर पहली चोट की।
उज्जैन।रविवार को गेती की एक चोट ने सड़क की चौड़ाई तो बढ़ाई, *लेकिन शायद किसी के भीतर का एक कोना थोड़ा और छोटा कर दिया होगा।*
वह मकान कोई साधारण मकान नहीं था। वह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का पैतृक घर था—वही घर, जिसकी दीवारों ने उनका बचपन देखा होगा। *जहां कदमों ने चलना सीखा होगा, जहां स्कूल जाने की जल्दी रही होगी, जहां मां की आवाज ने पुकारा होगा और जहां शामें आज की तरह मुख्यमंत्री की व्यस्तताओं में नहीं, बल्कि बच्चे मोहन की दुनिया में ढलती रही होंगी।*
फिर एक दिन वही बच्चा बड़ा होकर मुख्यमंत्री बना और *उसी घर के सामने विकास की गेती लेकर खड़ा हो गया।*
गेती हाथ में थी, मगर सामने सिर्फ दीवार नहीं थी।
*सामने बचपन खड़ा था।*
क्या उन्हें वह आंगन याद आया होगा? क्या किसी कमरे की कोई खिड़की अचानक बोल उठी होगी? क्या दीवार की कोई दरार उन्हें उन दिनों तक ले गई होगी, जिन्हें समय ने बहुत पीछे छोड़ दिया है?
*हम नहीं जानते।*
और शायद यही इस दृश्य की सबसे खूबसूरत बात है—
*भावनाएं कैमरे में पूरी तरह दिखाई नहीं देतीं।*
सड़क खजूर वाली मस्जिद से अब्दालपुरा, जीवाजीगंज थाना होते हुए गणेश चौक तक चौड़ी होगी। करीब 730 मीटर लंबे मार्ग को 15 मीटर किया जाएगा और लगभग 9.80 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सिंहस्थ के दौरान यातायात और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यह जरूरी विकास है।
लेकिन इस विकास की कहानी में एक निजी अध्याय भी है।
किसी और का मकान टूटता तो शायद वह सिर्फ एक निर्माण होता,
*अपना मकान टूटे तो इतिहास टूटता है।*
बचपन लौटकर नहीं आता। मकान फिर बन सकता है, सड़क फिर चमक सकती है, शहर आगे बढ़ सकता है। *लेकिन जिस घर में बचपन बीता हो, उसकी मिट्टी को छोड़ना शायद विकास की सबसे महंगी कीमतों में से एक है।*
और रविवार को उज्जैन ने शायद यही देखा-
*एक मुख्यमंत्री ने अपने हाथ से दीवार नहीं, अपनी स्मृतियों और सार्वजनिक दायित्व के बीच की दूरी पर पहली चोट की।
लेखक-
प्रशांत अंजाना-

