नई दिल्ली ।मारुति सुजुकी इंडिया ने हरियाणा के मानेसर स्थित अपने विनिर्माण संयंत्र में 300 किलोवाट क्षमता वाले ग्रीन हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइजर प्लांट का संचालन शुरू कर दिया है। इस परियोजना को स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल और उत्पादन प्रक्रिया से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा रहा है।
यह परियोजना पायलट आधार पर संचालित की जाएगी। इसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करके ग्रीन हाइड्रोजन तैयार की जाएगी। तैयार हाइड्रोजन को प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर विनिर्माण गतिविधियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। इससे उत्पादन प्रक्रिया में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू मानेसर संयंत्र में पहले से स्थापित सौर ऊर्जा प्रणाली का बेहतर उपयोग करना है। छुट्टियों या कम उत्पादन वाले दिनों में जब संयंत्र में उपलब्ध सौर ऊर्जा का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाता, तब अतिरिक्त बिजली का उपयोग हाइड्रोजन उत्पादन के लिए किया जाएगा।
इसके लिए अतिरिक्त सौर ऊर्जा से इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए ग्रीन हाइड्रोजन तैयार की जाएगी। उत्पादन के बाद हाइड्रोजन को संग्रहित किया जाएगा और आवश्यकता के अनुसार विनिर्माण कार्यों में इसका उपयोग किया जाएगा। इस व्यवस्था से अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा को उपयोगी ईंधन में बदलने की दिशा में काम किया जाएगा।
इस परियोजना को भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक के व्यापक इस्तेमाल के लिए एक लर्निंग प्लेटफॉर्म के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। इससे हरियाणा और गुजरात में स्थित अन्य विनिर्माण इकाइयों में इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाओं को समझने और आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
यह पहल केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अनुरूप है। इसके साथ ही यह उत्पादन गतिविधियों में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
कंपनी के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हिसाशी ताकेउची ने कहा कि कंपनी ने अपने उत्पादों के साथ-साथ विनिर्माण प्रक्रियाओं के लिए भी मल्टी-पाथवे रणनीति अपनाई है। उनके अनुसार, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजना के अलावा सौर ऊर्जा, बायोगैस और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में भी निवेश किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत तेजी से वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है। ऐसे में भविष्य में प्रतिस्पर्धात्मकता का निर्धारण केवल लागत और गुणवत्ता से नहीं होगा, बल्कि कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
कंपनी के अनुसार, वह कम-कार्बन और ऊर्जा दक्ष विनिर्माण के लिए आवश्यक क्षमताएं अभी से विकसित कर रही है। इसके तहत विनिर्माण परिचालनों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी लाने का लक्ष्य तय किया गया है।
वित्त वर्ष 2030-31 तक विनिर्माण परिचालनों से होने वाले उत्सर्जन को मौजूदा 6.15 लाख टन से घटाकर 2.66 लाख टन तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रीन हाइड्रोजन परियोजना इसी दिशा में उठाए गए कदमों में शामिल है।
