चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होना है। उन्होंने अगस्त में बोर्ड को बताया था कि वह मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद दोबारा पद पर बने रहने के इच्छुक नहीं हैं। इसके बावजूद बोर्ड ने उन्हें पांच साल और देने का प्रस्ताव मंजूर कर दिया। प्रस्ताव पर नोएल टाटा ने विरोध में वोट दिया। रिपोर्टों के मुताबिक बोर्ड में प्रस्ताव 4-1 से पारित हुआ।
नोएल टाटा ने क्यों किया विरोध?
इस पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति है। नोएल टाटा का तर्क है कि जब चंद्रशेखरन पहले ही 2027 के बाद पद छोड़ने की इच्छा बोर्ड को बता चुके थे, तो कंपनी को उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया आगे बढ़ानी चाहिए थी। टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को “कानूनी रूप से अमान्य” बताया है और कंपनी के Articles of Association से जुड़े प्रावधानों का हवाला दिया है।
यही वजह है कि यह मामला केवल चेयरमैन के कार्यकाल तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ टाटा संस के बोर्ड अधिकार, टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और कंपनी की लिस्टिंग का सवाल भी जुड़ गया है।
टाटा ट्रस्ट्स के पास 66% हिस्सेदारी
टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है। इसलिए बोर्ड के फैसले के बाद अगली महत्वपूर्ण परीक्षा शेयरधारकों की मंजूरी होगी। चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और लिस्टिंग से जुड़े फैसलों पर आगे की प्रक्रिया में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। ताजा रिपोर्टों में दोनों मुद्दों पर ट्रस्ट्स और बोर्ड के बीच मतभेद सामने आए हैं।
टाटा संस में शापूरजी पालोनजी समूह की हिस्सेदारी करीब 18.37% है। वह लंबे समय से लिस्टिंग के पक्ष में रहा है। लिस्टिंग से उसे अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेचकर कर्ज घटाने का रास्ता मिल सकता है।
IPO का रास्ता क्यों खुला?
टाटा संस के लिए IPO का मुद्दा अचानक नहीं आया है। सितंबर 2022 में RBI ने कंपनी को अपर-लेयर NBFC के रूप में वर्गीकृत किया था। इस श्रेणी की कंपनियों के लिए नियामकीय नियमों के तहत शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी है।
टाटा संस ने इस व्यवस्था से बाहर निकलने के लिए मार्च 2024 में अपना NBFC/CIC पंजीकरण सरेंडर करने का आवेदन दिया था। कंपनी ने करीब 21-22 हजार करोड़ रुपए का कर्ज चुकाकर खुद को नियामकीय ढांचे से बाहर करने की कोशिश की थी। लेकिन 11 सितंबर 2026 को RBI ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद कंपनी के सामने लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता प्रमुख विकल्प बन गया।
गुरुवार को बोर्ड ने RBI के फैसले को चुनौती देने के बजाय लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया। हालांकि, टाटा संस ने अभी IPO की तारीख, आकार या शेयर बिक्री का औपचारिक ऐलान नहीं किया है।
चंद्रशेखरन का तीसरा कार्यकाल क्यों अहम?
एन. चंद्रशेखरन करीब चार दशक से टाटा समूह से जुड़े हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत TCS से की और आगे चलकर कंपनी के CEO और MD बने। फरवरी 2017 में उन्हें पहली बार टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया था। 2022 में उन्हें दूसरा कार्यकाल मिला।
उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने पारंपरिक कारोबार के साथ एयरलाइन, डिजिटल, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और बैटरी जैसे क्षेत्रों में विस्तार किया। एयर इंडिया का अधिग्रहण भी इसी दौर की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा।
आपकी दी गई जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2020 में टाटा समूह का रेवेन्यू 7.89 लाख करोड़ रुपए था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 16.24 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया। इसी तरह लिस्टेड कंपनियों का संयुक्त मार्केट कैप 2020 में करीब 9.31 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2026 में 24 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया।
असली मतभेद सिर्फ चेयरमैन पद पर नहीं
चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच मतभेदों की चर्चा पिछले कुछ महीनों से होती रही है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों के बीच नए कारोबारों में निवेश, पूंजी आवंटन और कुछ कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन को लेकर अलग-अलग राय रही है। खासकर एयर इंडिया और टाटा डिजिटल जैसे नए कारोबारों में भारी निवेश और घाटे को लेकर निगरानी बढ़ाने की मांग का मुद्दा सामने आया है।
यानी मौजूदा विवाद को केवल इस सवाल से नहीं समझा जा सकता कि चंद्रशेखरन चेयरमैन रहेंगे या नहीं। इसके पीछे टाटा संस की रणनीति, पूंजी का इस्तेमाल, लिस्टिंग और टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका जैसे कई बड़े सवाल जुड़े हैं।
टाटा संस की वैल्यू कितनी?
मार्च 2026 तक टाटा संस का एसेट बेस करीब 2.01 लाख करोड़ रुपए बताया गया है। RBI के नियामकीय ढांचे में कंपनी का आकार भी महत्वपूर्ण है। संभावित लिस्टिंग के चलते बाजार में इसके वैल्यूएशन को लेकर कई अनुमान लगाए जा रहे हैं। कुछ विशेषज्ञ अनुमानों में यह 7 लाख करोड़ से 11 लाख करोड़ रुपए के बीच बताया गया है, हालांकि वास्तविक मूल्यांकन IPO प्रक्रिया, बाजार परिस्थितियों और कंपनी के अंतिम स्ट्रक्चर पर निर्भर करेगा।
टाटा संस की बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी के कारण इसकी लिस्टिंग भारतीय पूंजी बाजार में महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो सकती है। हालांकि अभी IPO का अंतिम आकार और समयसीमा तय नहीं हुई है।
टाटा संस में किसकी कितनी हिस्सेदारी?
टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66% हिस्सेदारी है। शापूरजी पालोनजी समूह के पास करीब 18.37% हिस्सा है। इसके अलावा टाटा समूह की कंपनियों—TCS, टाटा मोटर्स और टाटा स्टील—की हिस्सेदारी भी है।
लिस्टिंग होने की स्थिति में शेयरधारकों के लिए अपनी हिस्सेदारी का मूल्य तय करने और जरूरत के मुताबिक हिस्सेदारी बेचने का रास्ता खुल सकता है। दूसरी तरफ टाटा समूह के लिए बाजार से पूंजी जुटाने का विकल्प भी बढ़ेगा।
टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस और टाटा ग्रुप में अंतर
टाटा ग्रुप: टाटा ब्रांड के तहत काम करने वाली 30 से अधिक प्रमुख सार्वजनिक और निजी कंपनियों का व्यापक कारोबारी समूह है। इसमें TCS, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाइटन, एयर इंडिया और ट्रेंट जैसी कंपनियां शामिल हैं।
टाटा संस: यह टाटा ग्रुप की प्रमुख होल्डिंग और प्रमोटर कंपनी है। समूह की बड़ी कंपनियों में इसकी हिस्सेदारी है और ‘टाटा’ ब्रांड के इस्तेमाल से जुड़े अधिकार भी इसी के पास हैं। फिलहाल यह अनलिस्टेड कंपनी है।
टाटा ट्रस्ट्स: सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट समेत विभिन्न परोपकारी ट्रस्टों का समूह है। टाटा संस में करीब 66% हिस्सेदारी होने के कारण इसकी भूमिका कारोबारी फैसलों में भी महत्वपूर्ण है। इसके संसाधनों का बड़ा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण से जुड़े कामों में लगाया जाता है।
फिलहाल चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और टाटा संस की लिस्टिंग दोनों ही अगले चरण की मंजूरियों और नियामकीय प्रक्रिया पर निर्भर हैं। बोर्ड के फैसले के बाद अब निगाह इस बात पर है कि टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी के बीच यह मतभेद किस तरह आगे बढ़ता है।
