25 वर्षीय धीरज ने पूरे टूर्नामेंट में जबरदस्त प्रदर्शन किया। विश्व रैंकिंग में 10वें स्थान पर मौजूद सेना के इस जवान ने क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल में अपनी सटीक निशानेबाजी का दम दिखाया। फाइनल में उनका सामना दुनिया के 20वें नंबर के जापानी तीरंदाज नाकानिशी जुन्या से हुआ। मुकाबला पांच सेट तक चला और दोनों खिलाड़ियों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली। पांच सेट के बाद स्कोर 5-5 से बराबर था। इसके बाद फैसला शूट ऑफ से हुआ जहां धीरज ने 10-9 के अंतर से जीत दर्ज करते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमा लिया।
धीरज की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि विश्व कप फाइनल में भारतीय पुरुष रिकर्व तीरंदाज के लिए इससे पहले स्वर्ण पदक का सपना अधूरा रहा था। भारत की ओर से जयंत तालुकदार ने 2010 में एडिनबर्ग में विश्व कप फाइनल में कांस्य पदक जीता था। इसके बाद लंबे समय तक भारतीय पुरुष रिकर्व तीरंदाज इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में स्वर्ण हासिल नहीं कर सके। अब धीरज ने उस सूखे को खत्म कर इतिहास अपने नाम कर लिया है।
धीरज की सफलता के पीछे सिर्फ उनकी प्रतिभा नहीं बल्कि परिवार का संघर्ष और त्याग भी छिपा है। करियर के शुरुआती दौर में परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी। साल 2017 में बेहतर प्रशिक्षण के लिए उन्हें महंगे विदेशी उपकरणों की जरूरत थी लेकिन पैसों की कमी बड़ी चुनौती बन गई। हालात यहां तक पहुंच गए कि धीरज की मां रेवती ने बेटे का सपना पूरा करने के लिए अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख दिया। इसी रकम से उनके लिए नया धनुष खरीदा गया।
एक समय धीरज तीरंदाजी छोड़ने का मन भी बना चुके थे लेकिन परिवार के भरोसे ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। उनके पिता श्रवण कुमार भी तीरंदाजी से जुड़े रहे और आंध्र प्रदेश के वरिष्ठ तीरंदाजी जजों में शामिल हैं। परिवार के इसी समर्थन और धीरज की मेहनत ने उन्हें आज दुनिया के शीर्ष तीरंदाजों में खड़ा कर दिया है।
इस साल जून में तुर्किये के अंताल्या में विश्व कप स्टेज तीन में धीरज ने दो स्वर्ण पदक जीतकर अपनी शानदार फॉर्म का संकेत दिया था। अब विश्व कप फाइनल में गोल्ड जीतकर उन्होंने भारतीय तीरंदाजी के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया है। विश्व कप फाइनल में इससे पहले भारत के लिए डोला बनर्जी ने 2007 में महिला व्यक्तिगत वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था। धीरज की जीत ने पुरुष वर्ग में भी भारत का झंडा सबसे ऊंचा कर दिया है।
