सदियों पुरानी कबीलाई ताकत का नया चेहरा
यमन के पहाड़ी इलाकों से निकल रहे इस काफिले में परंपरागत पोशाक और जाम्बिया पहने लड़ाके भी दिखाई दे रहे हैं। फर्क इतना है कि पुराने दौर के घोड़ों और तलवारों की जगह अब पिकअप ट्रक, मशीनगन और रॉकेट लॉन्चर हैं।
बनी हशीश कबीले का क्षेत्र सना के पूर्व में पहाड़ों में फैला है। राजधानी के बेहद करीब होने के कारण इसका रणनीतिक महत्व काफी बड़ा है। यहां प्रभाव रखने वाली ताकतें सना के पूर्वी रास्तों और आसपास के इलाकों पर असर डाल सकती हैं।
यमन में जनजातियां केवल सामाजिक इकाइयां नहीं रही हैं। दशकों से उनका राजनीतिक और सैन्य प्रभाव भी रहा है। बनी हशीश इसी कबीलाई शक्ति का उदाहरण है।
कभी हूतियों से हुई थी खूनी लड़ाई
हूतियों और बनी हशीश के रिश्ते हमेशा से एक जैसे नहीं रहे। 2000 के दशक में हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती के नेतृत्व में आंदोलन उभरने और 2004 के बाद हूती विद्रोह शुरू होने के दौरान उत्तरी यमन की कई जनजातियां बदलते सत्ता समीकरणों में उलझी थीं।
2008-09 के आसपास बनी हशीश के कुछ हिस्सों और हूती लड़ाकों के बीच गंभीर संघर्ष हुआ था। उस समय दोनों पक्ष एक-दूसरे के विरोध में खड़े थे।
हालात 2014 में बदले, जब हूतियों ने सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में उनका सैन्य प्रभाव तेजी से बढ़ा। कई स्थानीय जनजातियां या तो हूतियों के साथ आ गईं या उनके नियंत्रण में चली गईं। बनी हशीश भी इसी बदलाव का हिस्सा बना।
आज कबीले के कई प्रभावशाली लोग और लड़ाके हूती नेटवर्क से जुड़े बताए जाते हैं। इसलिए बनी हशीश की लामबंदी हूती नेतृत्व के लिए स्थानीय समर्थन के साथ-साथ सैन्य क्षमता बढ़ाने का जरिया भी मानी जाती है।
मरीब ही क्यों बना निशाना?
मरीब सना से करीब 175 किलोमीटर पूर्व में उत्तर-मध्य यमन में स्थित है। इसके पश्चिम में सना, उत्तर में अल-जौफ, दक्षिण में अल-बैदा और शबवा तथा पूर्व में हद्रमौत है। भौगोलिक स्थिति के कारण यह राजधानी और यमन के पूर्वी रेगिस्तानी इलाकों के बीच महत्वपूर्ण संपर्क क्षेत्र है।
मरीब की अहमियत केवल उसके स्थान तक सीमित नहीं है। यह यमन के प्रमुख तेल और गैस क्षेत्रों में शामिल है। 1980 के दशक में यहां बड़े व्यावसायिक तेल भंडार मिले थे। तेल और गैस के अलावा यहां देश का एक महत्वपूर्ण बिजली संयंत्र भी है। मरीब, शबवा और हद्रमौत को मिलाकर यमन का प्रमुख तेल-गैस बेल्ट बनता है।
यही वजह है कि मरीब पर नियंत्रण की लड़ाई में सत्ता के साथ ऊर्जा संसाधनों का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
हूतियों के लिए मरीब पर कब्जा क्यों अहम
मरीब लंबे समय से हूती विरोधी यमनी सरकार और स्थानीय कबीलों का मजबूत गढ़ रहा है। ऐसे में यहां अपनी पकड़ बनाना हूतियों के लिए कई मोर्चों पर फायदा दे सकता है।
मरीब पर दबाव बढ़ने से सना के पूर्व में हूतियों की स्थिति मजबूत होगी। साथ ही उन्हें यमन के ऊर्जा संसाधनों के करीब पहुंच और पूर्वी इलाकों की ओर रणनीतिक रास्तों पर प्रभाव हासिल करने का मौका मिल सकता है।
2021 में भी हूती सेना ने मरीब पर कब्जे के लिए बड़ा अभियान चलाया था। हालांकि स्थानीय कबीलों और सरकार समर्थक बलों ने उनका मुकाबला किया और हूतियों को सफलता नहीं मिली।
अब 2026 में फिर बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच मरीब महत्वपूर्ण हो गया है। पश्चिमी यमन में हूतियों ने बड़े इलाकों और रणनीतिक बंदरगाहों पर बढ़त बनाई है, जबकि दूसरी ओर सऊदी समर्थित यमनी बल उनके खिलाफ दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
सऊदी अरब की चिंता सिर्फ मरीब तक सीमित नहीं
बनी हशीश की यह लामबंदी सीधे सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता से भी जुड़ती है। मरीब फिलहाल सऊदी समर्थित यमनी सरकारी सेना के नियंत्रण में है और यह इलाका सना से सऊदी सीमा की ओर जाने वाले रणनीतिक क्षेत्र का हिस्सा है।
यदि हूती मरीब पर कब्जा करने में सफल होते हैं तो सना के पूर्व में उनकी पकड़ मजबूत हो सकती है। इसके साथ ही तेल-गैस संसाधनों और रणनीतिक मार्गों तक उनकी पहुंच बढ़ने की आशंका है।
सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि मरीब में हूतियों की स्थिति मजबूत होने पर उन्हें सऊदी सीमा की दिशा में रणनीतिक दबाव बढ़ाने के लिए बेहतर भौगोलिक स्थिति मिल सकती है। इससे मिसाइल और ड्रोन हमलों के लिए उनका ऑपरेशनल स्पेस और संसाधन भी बढ़ सकता है।
यानी बनी हशीश की पहाड़ों से हुई यह लामबंदी सिर्फ एक कबीले के लड़ाकों की आवाजाही नहीं है। इसके पीछे मरीब की सत्ता, यमन के तेल-गैस संसाधन और सऊदी अरब की सुरक्षा—तीनों के समीकरण जुड़े हुए हैं।
